Sunday, February 20, 2011

मुलाकात....


हमारी दो पल की वो मुलाकात कम थी
वो बिन मौसम हुई बरसात कम थी
तुम भी चुप थे , मैं भी चुप थी...
पर आखों से हुए वो आखों की बात कम थी ...
समंदर की लहरों पे वो साथ चलना...
सूरज को क्षितिज पे ढलते हुए देखना ....
तुम साथ थे ,पर वो सुहानी शाम कम थी...
एक अनजाने परिवार से वो मिलना...
थोरी देर में ही उसका अपना बनना ...
सब कितने खुश थे, पे वो खुशी निभाने को वो रात कम थी...
मंदिर की सीढियों पे वो साथ चढ़ना...
पूजा की थाली हाथ में ले के चलना...
दोनों मांग रहे थे एक ही दुआ , पर दुआ में वो आस कम थी...


Monday, February 7, 2011

दिल चाहता है......


फिर से सपने सजाने को दिल चाहता है......
तुमसे मिल के आने को दिल चाहता है .....
है तुम्हारे मानाने का अंदाज़ कुछ ऐसा.....
की फिर से रूठ जाने को दिल चाहता है.....
तुम्हारे साथ हर पल है इतना खुबसूरत ....
की हर पल में बस जाने को दिल चाहता है.....
तुमसे हर सुबह होती है इतनी सुहानी.....
की हर रात को भूल जाने का दिल चाहता है....
हर शाम है दिलकश तुम्हारे होने से....
की हर सुबह को फूक से उड़ाने को दिल चाहता है....
नयी मंजिल मिली है मुझे तुम में...
की हर खुशी को तुमसे मिलाने को दिल चाहता है ....
ज़िन्दगी को खुशियों से भर दिया है तुमने ....
की अब तुम्हे दिल में सजाने को दिल चाहता है...
फिर से सपने सजाने को दिल चाहता है......
तुमसे मिल के आने को दिल चाहता है .....

Tuesday, January 25, 2011

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


२६ जनवरी और १५ अगस्त को छुट्टी की तरह मानते है...

आस-पास कुछ गलत हो तो खुद से चुनी गई सरकार को बुरा भला सुनाते है...

हर नियम,क़ानून को तोड़ते मरोडते चले जाते है...

फिर भी हम गर्व से खुद को हिन्दुस्तानी कहलवाते है...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Saturday, December 25, 2010

ये तू ही कर सकती है ... माँ ...


फरमाएश पे मेरे वो चीनी की रोटी बनाना..
मुझे अपनी थाली का पहला निवाला खिलाना..
आचल की छाव से मुझे सूरज से बचाना..
मेरी बिखरी चीजों को वापस सजाना ...
ये तू ही कर सकती है माँ... ये तू है कर सकती है ...

सर्दियों में वो कोयला जलना...
गरम कपड़ो में मुझे ढक कर बिठाना...
मुझे वो हल्दी वाला दूध पिलाना ...
मेरी गलतियों पे वो प्यार से समझाना...
ये तू ही कर सकती है माँ... ये तू ही कर सकती है...

मेरी जिद्द पे वो अपनी इक्षाए लुटाना ...
हस के वो मेरे सारे नखरे उठाना...
मेरे गुडिया की खातिर वो अपनी साडी ना लाना...
मेरे सपनो को ही अपने सपने बनाना ...
ये तू ही कर सकती है माँ ... ये तू ही कर सकती है...

अपनी नींद गवा कर मुझे रात भर सुलाना ...
मेरी रौशनी के लिए अपना खून जलना ...
जीवन की राहो पे डट के चलना सिखाना ...
मुसीबतों में भी शांत भाव दिखाना ...
ये तू ही कर सकती है माँ ... ये तू ही कर सकती है...

बिना बोले ही मेरी हर बात समझना ...
जो मैं ना कह पाती वो बात पापा से कहना...
मेरे उठाये हर कदम में मेरे साथ चलना ...
हर बार निष्पक्ष फैसला करना...
ये तू ही कर सकती है माँ...ये तू ही कर सकती है...

मुझे खुद से कभी जुदा ना करना...
बेटी को पराया धन ना समझना ...
मुझे तेरे साथ ही रहना है माँ....
तेरी ही आचल की छाव में बढ़ना है माँ ...
तेरे सारे सपने पूरे करने है ...
मुझे तेरी तरह ही निश्छल बहना है माँ...

Saturday, December 18, 2010

वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है


पहली बार में ही जो अपना सा नज़र आता है
खुली आखों में जो हजारो सपने रख जाता है
हर मोड़ पे जो जीने के सौ बहाने दिए जाता है
वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है
हर कोई जहा जगता और दुसरो को जगाता है
चौबीसों घंटे जहा इंसान , इंसानों के सैलाब में बहा जाता है
जो रात में भी दिन का मंज़र दिखलाता है
वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है
जहा ज़िन्दगी की रेल और हर बन्दा पटरियों पे भागता नज़र आता है
जहा हाजी अली के दर्शन को हर मज़हब का इंसान जाता है
सिद्धि विनायक की क़तर में मनप्रीत ,जोनी और अली भी खड़ा हो जाता है
वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है
बारिश में जो बड़ा टापू बन जाता है
छोटा बड़ा हर कोई चाहता है इसे
आमिरो का सौख , गरीबो का घर बार बन जाता है
वही महानगर जो आज कल मुंबई कहलाता है

Friday, November 19, 2010

गैरो में अपनों को तलाशते रहे ...
पत्थर से दिल को तराशते रहे ...
क्या मिला क्या खो दिया... इस बात का हिसाब कहा रख पाए...
अपने मन और हाथों पे ज़ख़्म लगा बठे...
कभी हम लोगो से कभी लोग हमसे बातें मनवाते रहे...
बेमानी ये रिश्ते निभाते रहे...
दुसरो की मैं मैं की लड़ाई में...
हम अपना अस्तित्व गवा बैठे ...

Sunday, September 19, 2010

ये रिश्ता क्या कहलाता है...

हजारो अनजाने चेहरों के बीच ... वो अपना सा नज़र आता है...
खुश होते है हम , जब वो कही मुस्काता है...
महसूस करते हम जलन उसकी ... जब सूरज उसे जलाता है ...
फिर पूछती है चेतना हमसे , ये रिश्ता क्या कहलाता है ...
उस के रंग में , अपना मन रंगता चला जाता है ...
जब अपनी तोतली जुबान में , वो अपनी भावना दर्शाता है ...
अनायास ही उसकी ओर धयान चला जाता है ...
कही दूर से जब वो नाम ले के बुलाता है ...
फिर पूछती है चेतना हमसे , ये रिश्ता क्या कहलाता है ...
यु ही मिला था वो सड़क के किनारे ...
अपने भरोसे अपनी भाग्य के सहारे...
ना नाम पता ना जात पता,
ना ही ये की कौन उस के जन्म दाता है ...
फिर पूछती है चेतना हमसे , ये रिश्ता क्या कहलाता है ...

Thursday, September 9, 2010

एक ऐसा बाज़ार भी ....

चाहे अल्ला हो या राम ही ...
यहाँ बिकते है भगवान् भी...
गड्ढे बिकते , खम्भे बिकते , बिकते है घर बार भी॥
इस पे आंसू क्यों बहते हो , जब बिकते है भगवान् भी ...
नींद बिकती , भूख बिकती , बिकते खेत खलिहान भी...
क्यों बेबस हो पड़े हो तुम , यहाँ बिकते है भगवान् भी...
गेंद बिकती , खेल बिकता , बिकते खिलाडी महान भी....क्यों सोच में बैठे हो बंधू ...
यहाँ तो बिकते है भगवान् भी...
फूल बिकते , पत्ते बिकते , बिकते खर पतवार भी...
निरास होने से क्या होगा , जब बिकते है भगवान् भी...
आंसू बिकते , खुशिया बिकती , बिकता यहाँ इंसान भी...
खुद को बचा के रखना भाई ....यहाँ बिकते है भगवान् भी...
धरती बिकती , अम्बर बिकता , बिकता हर इमानदार भी...
ये कलयुग है , यहाँ बिकते है भगवान् भी...
चाहे अल्ला हो या राम ही ... यहाँ बिकते है भगवान् भी...