Tuesday, July 20, 2010

ज़िन्दगी ... ये ज़िन्दगी....

ट्राफ्फिक सिग्नल से रूकती और भागती ये ज़िन्दगी...
भूखी आखों से खाने को ताकती ये ज़िन्दगी...
उम्र भर खुद से लड़ने के बाद , मजबूर हो अंत में मौत से हारती ये ज़िन्दगी...
हर रोज़ मेहनत कर शाम तक थकने के बाद,हर सुबह फिरसे पिसने को जगती ये ज़िन्दगी...
बंद काले शिशो के बहार से , दो वक़्त की रोटी मांगती ये ज़िन्दगी...
कभी फूल वाली , कभी बंदर , तो कभी बहरूपिया बन , न जाने कौन कौन से ताल पे नाचती ये ज़िन्दगी...
दो निवालो की चाह में , खुद को धुप में जलती ये ज़िन्दगी...
रूपये पाने जितनी मेहनत कर के , पैसो में अपना हिस्सा कमाती ये ज़िन्दगी...
ट्राफ्फिक सिग्नल से रूकती और भागती ये ज़िन्दगी...
हाँ ज़िन्दगी ... ये ज़िन्दगी....

11 comments:

  1. दो निवालो की चाह में , खुद को धुप में जलती ये ज़िन्दगी...
    रूपये पाने जितनी मेहनत कर के , पैसो में अपना हिस्सा कमाती ये ज़िन्दगी...


    bahut khoob.......

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  2. Thank you ...ye bas ek koshish hai sach ko shabdo main pirone ki...

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  3. wonderful thought........ just i got to know that u are a poetess too......

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  4. You should get the Nobel for Hindi Literaure :)

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  5. @Anand Bhiya : was waiting for ur valuble comment , thanks but my writing needs a lot improvement...

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  6. You have potential, Keep it up, get published. -Mama.

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  7. Bahut Achha hai..aur achhai ki demand hai....you have much potential..keeep on writing...and make collection of all poem for the publication in future.. My best wishes with you....Cheers!
    - Bhawesh Kumar Sah

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  8. di....very nice & lovely poem....wht a thought...i really salute it....keep it up...fantastic

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