Saturday, December 18, 2010

वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है


पहली बार में ही जो अपना सा नज़र आता है
खुली आखों में जो हजारो सपने रख जाता है
हर मोड़ पे जो जीने के सौ बहाने दिए जाता है
वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है
हर कोई जहा जगता और दुसरो को जगाता है
चौबीसों घंटे जहा इंसान , इंसानों के सैलाब में बहा जाता है
जो रात में भी दिन का मंज़र दिखलाता है
वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है
जहा ज़िन्दगी की रेल और हर बन्दा पटरियों पे भागता नज़र आता है
जहा हाजी अली के दर्शन को हर मज़हब का इंसान जाता है
सिद्धि विनायक की क़तर में मनप्रीत ,जोनी और अली भी खड़ा हो जाता है
वही शहर जो आज कल मुंबई कहलाता है
बारिश में जो बड़ा टापू बन जाता है
छोटा बड़ा हर कोई चाहता है इसे
आमिरो का सौख , गरीबो का घर बार बन जाता है
वही महानगर जो आज कल मुंबई कहलाता है

5 comments:

  1. क्या बात है....बहुत ही खुबसुरत रचना.....मुम्बई शहर का काव्य मंथन ही कर डाला आपने...बहुत ही सुंदर और सटीक...बस हरदम यूँही लिखती रहे,...शुभकामनाये।

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  2. िकसी ने सच ही कहा है मुंबई में लोग आते अपनी मर्ज़ी से है और जाते उसकी मर्ज़ी से....

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  3. by d way its gud to see the writer back.... :)

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  4. Want to see Mumbai..aapki poem pad ke lagta hai ki ek baar to jaana banta hai :-)

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